Sunday, November 29, 2015

उस दिन

तूफ़ान अब उठ रहे थे मन में,
बिजलिया खड़क रही थी जीवन में,
अब संहार करने था मैं तैयार,
ले चलने को नैय्या अब पार,
मैं भी भीषण अवतार में आया,
ओ बैरी तुमको क्यों नहीं भाया?
मैं भी कर सकता तब वार,
पर रोकने लगा था मेरा प्यार,
तुमको भी मैं अब क्या बतलाता,
तुमको भी अब क्या सिखलाता,
घडिया अब तो बित चुकी थी,
प्रेम की नदियाँ सुख चुकी थी,
अब तो बेहतर था कि चलने लगु,
तुम बिन ही जीवन में सँभालने लगु,
तुमको आना हो तो तुम आ जाना,
नहीं तो यादों के सहारे मैंने जीवन बिताना,
शायद कुछ तो कमियाँ मेरी भी होगी,
और कुछ तो गलतियां तेरी भी होगी,
पर भुगतना तो मुझे अब अकेला ही हैं,
क्योंकि तेरे लिए तो जिन्दगी वैसे भी मेला ही हैं |

अब तो मन भी धक-धक करने लगा था

अब तो मन भी धक-धक करने लगा था
और तकलीफों का घड़ा भी भरने लगा था |
शायद कुछ तो वजह थी कि खुशियाँ रूठ रही थी,
अब तो किसी के वापस आनेकी उम्मीदे छूठ रही थी |
लेकिन कौन समझाता अब इस मेरे पगले मन को,
कि लौटकर न आएगा वो महबूब इस जीवन को |
शायद अकेले ही मंझिल की ओर अब निकलना होगा,
शायद निर्भरता को परे कर खुद ही संभालना होगा |
मैं भी पहुंचूंगा एक दिन उस शिखर पर,
जहां बिना डगमगाते रिश्तों की हरियाली हो |
मैं जरुर पहुंचूंगा एक दिन वहां पर,
जहां खुशियाली भी बहुत निराली हो |