अब तो मन भी धक-धक करने लगा था
और तकलीफों का घड़ा भी भरने लगा था |
शायद कुछ तो वजह थी कि खुशियाँ रूठ रही थी,
अब तो किसी के वापस आनेकी उम्मीदे छूठ रही थी |
लेकिन कौन समझाता अब इस मेरे पगले मन को,
कि लौटकर न आएगा वो महबूब इस जीवन को |
शायद अकेले ही मंझिल की ओर अब निकलना होगा,
शायद निर्भरता को परे कर खुद ही संभालना होगा |
मैं भी पहुंचूंगा एक दिन उस शिखर पर,
जहां बिना डगमगाते रिश्तों की हरियाली हो |
मैं जरुर पहुंचूंगा एक दिन वहां पर,
जहां खुशियाली भी बहुत निराली हो |
No comments:
Post a Comment