हम वही करते हैं जो दिल को अच्छा लगता हैं| अब ना डर हैं जमाने का ना डर हैं मुसीबत के आने का | बस मन करे वो लिखते हैं, ना अब छिपते हैं ना छिपाते हैं | यहाँ संग्रह हैं तुकबंदियों का, कोशिश रहेगी की जब जब मौका मिले, नए नए डालता रहूँ|
Friday, September 25, 2015
नज़्म #८
ये कैसी इंसानियत हैं भाई कि,
कुछ पल की खुशियों के लिए तुम अपना ईमान छोड़ देते हो,
और कुछ बेगाने से सपनों के लिए किसी का दिल तोड़ देते हो?
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