हम वही करते हैं जो दिल को अच्छा लगता हैं| अब ना डर हैं जमाने का ना डर हैं मुसीबत के आने का | बस मन करे वो लिखते हैं, ना अब छिपते हैं ना छिपाते हैं | यहाँ संग्रह हैं तुकबंदियों का, कोशिश रहेगी की जब जब मौका मिले, नए नए डालता रहूँ|
Friday, September 25, 2015
नज्म #१२
मैं आज भी कुबूल करता हूँ, कि गिला-शिकवा करने से कुछ यूँ डरता हूँ,
जैसे वो अलबेला परिंदा डरता हैं पहली उड़ान अपनी भरने से पहले,
जैसे वो मदमस्त तितली डरती हैं अपनी आजादी धरने से पहले
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