कुछ गुमसुम गुमसुम सा रहता
मैं मेरी ही तन्हाईयों में
मेरे दिल के अरमान ढक जाते थे
खुद मेरी ही परछाइयों में
कुछ खफा खफा सा रहता
मैं मेरी ही अंगड़ाइयों में
मेरे अक्स हमेशा खो जाते थे
खुद मेरी ही गहराइयों में
जो सोचता हूँ मैं कभी कभी
की तुम न होती तो क्या होता
फिर दिल से मेरे एक आवाज़ निकलती
की तुम्हारे बिन तो में अधुरा होता
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