Wednesday, October 22, 2014

सिगरेट सी ये जिन्दगी

क्यों तुम बदनाम करते हो उस बिचारे सिगरेट को
क्यों तुम देख नहीं पाते जो दिखाना चाहता हैं वो सब को
सिगरेट को तुम मान लो जैसे की जिन्दगी सा
नशा उसका उतना ही जितना हैं जिन्दगी का

जैसे सिगरेट एक बार जल जाए तो जो होता है
वैसे ही जिन्दगी जो जलने लगे तो सब मुश्किल होता हैं
साँसे थोड़ी मद्दम सी हो जाती हैं
नशा जैसे चढ़ता हैं नफ्ज़ ढीली पढ़ जाती है

पर सीखना उस सिगरेट से ये हैं हम सब को
की जलना तो सभी को दिन हैं जिन्दगी में
बस तय करना हैं की राख बन जमीं में मिल जाना हैं
या धुँआ बनके सब के ऊपर उठ जाना हैं

क्योंकि राख जो मिल जाए मिटटी में एक बार
न उसका कोई वजूद हैं न उसका कोई परवरदिगार
लेकिन उठ गए जो एक बार धुएँ से
तो कौन रोक पायेगा तुम्हे

बस हवा की रुख से हाथ मिलाकर
उड़ चलो इस सबसे दूर जहा सब अलग हो
जहां जिन्दगी भी नयी होगी और कोई जला नहीं पायेगा
हाथ तुम्हारे न बंधे होगे और दिल न कोई तोड़ जायेगा

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