Sunday, November 29, 2015

उस दिन

तूफ़ान अब उठ रहे थे मन में,
बिजलिया खड़क रही थी जीवन में,
अब संहार करने था मैं तैयार,
ले चलने को नैय्या अब पार,
मैं भी भीषण अवतार में आया,
ओ बैरी तुमको क्यों नहीं भाया?
मैं भी कर सकता तब वार,
पर रोकने लगा था मेरा प्यार,
तुमको भी मैं अब क्या बतलाता,
तुमको भी अब क्या सिखलाता,
घडिया अब तो बित चुकी थी,
प्रेम की नदियाँ सुख चुकी थी,
अब तो बेहतर था कि चलने लगु,
तुम बिन ही जीवन में सँभालने लगु,
तुमको आना हो तो तुम आ जाना,
नहीं तो यादों के सहारे मैंने जीवन बिताना,
शायद कुछ तो कमियाँ मेरी भी होगी,
और कुछ तो गलतियां तेरी भी होगी,
पर भुगतना तो मुझे अब अकेला ही हैं,
क्योंकि तेरे लिए तो जिन्दगी वैसे भी मेला ही हैं |

अब तो मन भी धक-धक करने लगा था

अब तो मन भी धक-धक करने लगा था
और तकलीफों का घड़ा भी भरने लगा था |
शायद कुछ तो वजह थी कि खुशियाँ रूठ रही थी,
अब तो किसी के वापस आनेकी उम्मीदे छूठ रही थी |
लेकिन कौन समझाता अब इस मेरे पगले मन को,
कि लौटकर न आएगा वो महबूब इस जीवन को |
शायद अकेले ही मंझिल की ओर अब निकलना होगा,
शायद निर्भरता को परे कर खुद ही संभालना होगा |
मैं भी पहुंचूंगा एक दिन उस शिखर पर,
जहां बिना डगमगाते रिश्तों की हरियाली हो |
मैं जरुर पहुंचूंगा एक दिन वहां पर,
जहां खुशियाली भी बहुत निराली हो |

Monday, October 12, 2015

कुछ तुकबंदिया #18

मेरी अँधेरी गलियों में एक दिया जला गयी वो,
मेरे बंद पड़ी धडकनों को आज फिर चला गयी वो|
जो टूटा था टुकड़ा जिंदगी का, आज जोड़ गयी वो
कमबख्त आज जाते जाते भी, दिल की बंदिशे तोड़ गयी वो
न जाने क्यों मेरे बंद अरमानों का फिर पिटारा खोल गयी वो,
मेरे प्यार भरे जज्बातों को ना जाने क्यों चीजों से तोल गयी वो 

Sunday, October 11, 2015

नज़्म #१६

शायद कुछ तो उस दिन जिन्दगी में बदल रहा था,
शायद कोई तो उस दिन खुद में संभल रहा था,
पर क्या पता वो शायद हो ना हो इस जिन्दगी में,
पर क्या पता वो जज़्बात फिर आये न आये अब बेरुखी में|

काही मनातलं, कागदावर ओतलं - #१

मी तिची वाट बघत राहिलो, 
ती माझी वाट लावत राहिली,
मी आमच्या नात्यात ख़त टाकत गेलो,
आणि ती माझ्या आयुष्याची माती करत राहिली|

नज़्म #१५

जिसने जिंदगी में खुशियाँ और मुस्कुराहटें लायी थी,
उसके जाने पर आँसू कैसे बहा लेते हो दोस्त?

मतलब तो ये हुआ फिर कि वो सिखाती कुछ रही तुम सिखते कुछ और रहे,

और बेवजह अपनी गलतियों का इल्जाम उसके सर सारी जिंदगी मारते रहे.

कुछ तुकबंदिया # १७

न जाने कब जिंदगी के तराजू मे प्यार को नफरत से तोलने लगे,
न जाने कब छुपे अरमानों को किसी के सामने भी खोलने लगे,
न जाने कब हम इस कदर होने लगे|

नज़्म #१४

उस दिन जिंदगी में पहली बार ये एहसास हुआ, कि उसने जितनी exams ली, मैं उन सब में Pass हुआ, फिर भी न जाने क्यों वो कहती रही मैं fail आदमी हूँ ?

Monday, October 5, 2015

वादळ

काय माहित कधी, कशी,केव्हा आणि का ती आयुष्यात आली,

पण तिला बघता बघता थांबलेली आमची गाडी पुन्हा निघाली।

सुरुवातीला तिच्यासोबत नुस्तं बोलण्यात ही भरपूर मज्जा आली,

पण काय माहित कधी ह्या सगळ्यामधे, आयुष्याचा गोड़वाच ती झाली।

तिची ती हसण्याची, बोलण्याची, डोळे मारण्याची अदाच निराळी,

जी अंधारलेल्या निर्जीव आयुष्याची पण करुन सोडायची दिवाळी।

म्हणजे एखाद्या पाऊसानंतर जसं वादळ येतं, तशी ती आयुष्यात आली,

आणि तिन्हेच नकळत केलेल्या हिरवळीवर, ती परत माती करत निघाली।

पण आता तर काही नसण्यापेक्षा ती उद्ध्वस्त ओली मातीच परवडली,

आणि गाज़ा-वाजा करत निघालेली ती आमची प्रेमाची गाडी रखडली।

Monday, September 28, 2015

The Hurdle

You might know me as one unnecessary hurdle ,
But trust me i never wanted you to unnecessarily curdle,
Rather i always wished, that you smile all along your way,
And all i wanted was to be the reason of ur smile everyday.

नज्म #१३

बस इतनी सी अब हमारी कहाणी हैं,
जो आपने जरुर सुनी किसीके जुबानी हैं,
कि कोहराम तो उसके लिए आज भी मचा देते बेझिझक, लेकिन अंजाम देखने के लिए अब वो न रही, और उसे बताने वालों के साथ हम ना रहे|

Saturday, September 26, 2015

कुछ तुकबंदिया #१६

एक दिन मेरा भी वहां आशियाँ होगा,
जहां बसा हुआ उसका खुदा होगा | 

Friday, September 25, 2015

बस कुछ यूँ ही लिखे शब्द

१. तैरना आता हो या नहीं ये तो वैसे ही बेकार की बातें हो जाती हैं,
जब नाव में छेद भी तुम ही ने कर रखे हो|

२. खड़ा तो उसके सामने उस दिन भी हो जाता जिस दिन वो निकल पडी थी,
लेकिन अडा रहूँ अब इतनी न हिम्मत बची थी अब और न ही ताकद |

३. जिन्दगी में मौसम का हाल कुछ यूँ हैं आजकल,
कि बारिश तक्कलुफ़ ले इससे पहले ही तूफ़ान उजाड़ जाते हैं हमारा बसेरा.

४. उस वक़्त की तलाश में, जब छोड़ दिया जीना भागते हुए एक 'काश' के

५. Optimism की सिट्टी बिट्टी तो हम तभी गुल कर देते हैं,
जब 'क्या बोया जिन्दगी में' पूछने की बजाय 'क्या उखाड़ लिया' ये पूछ बैठते हैं!

नज्म #१२

मैं आज भी कुबूल करता हूँ, कि गिला-शिकवा करने से कुछ यूँ डरता हूँ,
जैसे वो अलबेला परिंदा डरता हैं पहली उड़ान अपनी भरने से पहले,
जैसे वो मदमस्त तितली डरती हैं अपनी आजादी धरने से पहले

कुछ तुकबंदिया #१५

तेरी यादों के सायों में ही मैं कुछ चुप-छुप कर यूँ रहता था, तेरे नखरों के तूफानों को मैं नींदों के किनारो पर भी सहता था |

कुछ तुकबंदिया #१४

तेरी बची हुई धुंधली यादों को पकड़कर ही आज भी rhyme कर लेता हूँ, मिलना तो मुश्किल, पर इसी बहाने आजकल तेरे नाम अपना time कर देता हूँ |

कुछ तुकबंदिया #१३

आज भी कुछ बेहोश सा हो जाता हूँ, जब डूबता हूँ उसकी black-black eyes में, कि एक अजीब सी उंचाई होती हैं खूबसूरती की जैसे blue-blue skies में |

कुछ तुकबंदिया #१२

यूँ तिरकी - तिरकी नजरों से क्यों मुझे यूँ misguide करती हो, शायद मुझे देख कर मुस्कुराओं या नहीं ये decide करती हो|

नज्म #११

मैं उसे आज भी ढूंढता-फिरता हूँ गलियों -चौबारों में, बस एक सवाल पूछने के लिए कि, क्यों उसने बेवफाई भर दी हमारे प्यार के गुब्बारों में?

कुछ तुकबंदिया #९

एक किस्सा हमारा भी हुआ करता था किसी जमाने में, जब सिर्फ प्यार भरी बातें भी चल जाती थी रात के खाने में |

कुछ तुकबंदिया #८

जिसने वक़्त की कगार पर, कर ली नौकरी २ रु. की पगार पर, वैसा आज का हमारा engineer हैं, ऐसा लाचार-बेबस हमारा engineer हैं |

नज्म #१०

गिले शिकवे न होंगे किसीको फिरसे, जिस दिन इल्म इस बात का हो जाए कि सितारों के आगे जहां और भी हैं, और खुशियों के ही माइने बसे वहां भी हैं|

नज्म #९

उसके लिए तो समुन्दर भी खाली कर देते, फिरसे जो मुस्कुरा देती वो एक बार, लेकिन शायद अब उसकी प्यास मिट चुकी थी और हमारी तो कबकी मर चुकी थी

कुछ तुकबंदिया #७

प्यार के नाम पर कमबख्त कमसेकम बेवफाई के माइने तो सिखा गयी, आने वाली अंधेरी जिन्दगी से पहले रौशनी में रखे आईने तो दिखा गयी |

नज़्म #८

ये कैसी इंसानियत हैं भाई कि, कुछ पल की खुशियों के लिए तुम अपना ईमान छोड़ देते हो, और कुछ बेगाने से सपनों के लिए किसी का दिल तोड़ देते हो?

Wednesday, September 2, 2015

ऐसा मैं, प्रेम पुजारी

दिल सिकुड़ते हुए भी जिसका होता था भारी|
जो सबकी सुनकर ही तो जिया उम्र सारी||
ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |

जो सोचता साथ जिन्दगी एक बने हमारी|
पर हाथ लगी आखिर जिसके मक्कारी||
.ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |


उसे जिताने पहुँच जाता, जब जब वो हारी|
भगवान को भी जिसने चुनौतियां दे दी सारी||
ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |

उसकी बहती खुशियों की जो हर पल सीता था क्यारी|
बदले में उसे आखिर तक फिर भी मिली धिक्कारी ||
ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |


न बुझी जिसे कभी किसी की कोई समझदारी |
बस भागता रहा उसके लिए जो अपनी जिन्दगी सारी||
ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |

लहू बहाया जिसने उसके आंसुओं से भी भारी|
और प्यार को ही समझ बैठा जो आखिरी दम तक होशियारी ||
ऐसा मैं,
प्रेम पुजारी |




Monday, October 27, 2014

कुछ तुकबंदिया -#8

एक दिन फिर ऐसी होगी सुबह
की चाँद भी ख़ुशी से ढल जायेगा
उजाला इतना होगा चारो ओर कि
मोहब्बत का नया संदेश जरुर आएगा

Wednesday, October 22, 2014

शमा कह गयी दीवाने से

शमा कह गयी दीवाने से,
तू भी एक दिन खिलेगा फूलों की तरह,
ख्वाइशों का सूरज निकलने के बाद।
दीवाना भी कह गया शमा से,
खिलूँगा मैं एक दिन ये तो तय हैं,
लेकिन सिर्फ मेरे चाँद को पाने के बाद।।

I have missed you!

I have missed you like
its been a thousand years
I have missed you even
when battling my fears

I want you in my life today
I want you in my life tomorrow
To hold my hand n walk for miles
And to be the reason of your smiles

And the truth is i want you
even after a million tears
Because its only n only you
who can buy me "the happiness pears"

The day I fell for you!

The day i fell for you head over heels,
is when u looked at me for awhile,
n before i could tell how my heart feels,
u rejected my love with a wicked smile.

Love was something very new to me,
n so were you at that point of time,
Yet i dared to dream of our chemistry
N in reality love ended up with my mime

कुछ तुकबंदिया - #7

उसका दिल जलाने में एक अलग सा मजा है
उसकी नींदे चुराने की भी मजेदार जो सजा हैं
उसके ख्वाबों में सिसक जाने की एक वजह हैं
वही इश्क का बाजा अब मेरे भीे दिल में बजा हैं!

हिसाब

मेरी इन दर्द भरी आँखों से
तू चाहे जितने आँसू निचोड़ लेना
ना भरे तेरा मन अगर फिर भी
तो मुझसे अपना रुख तू मोड़ लेना

मैं इंतजार करूँगा तेरे वापस लौटने का
मैं दीदार करूँगा तेरे संग बिताये लम्हों का
मैं वापस मिलूँगा तुझसे एक दिन फिर
लेने हिसाब मेरे हर एक आँसू का।
लेने हिसाब मेरे हर एक दर्द का।।

तेरा नाम

तेरा नाम भी जुबां पर आता हैं
तो मेरी रूह काँप उठती हैं
तेरा जिक्र भी कही सुनता हूँ
तो मेरे दिल की धड़कने बढती हैं

तेरी महक भी जो आ जाये
तो मेरा रोम-रोम चहक उठता हैं
तुझे मुस्कुराता जो मैं कभी देख लूँ
तो जैसे साँसों का आना रुख सा जाता हैं

ये कैसी मेरी जिंदगी कर दी हैं तुन्हें
जहा भी जाता हूँ पागलों सा मुस्काता हूँ
न वजह होती हैं ना जगह होती हैं
फिर भी दिल से कोई गाना गाता हूँ

मस्त मैं दीवाना सा हो जाता हूँ
जब भी होटों पर तेरा नाम लाता हूँ
इस दर्दभरी जिन्दगी से आराम पाता हूँ
जब भी होटों पर तेरा नाम लाता हूँ

एक साल

एक साल बित गया हैं, जब तुमको सब बताया था
अपने दिल में जब तुमको जो मैंने बसाया था
जिस प्यार से डरता था वो तुमको जताया था
एक साल बित गया हैं, जब तुमको पहले हंसाया था

एक साल में क्या क्या हो गया हैं ये सब नहीं जानते
कितना जुड़ गया हूँ मैं तुमसे ये सब नहीं मानते
पर इन सब के लिए नहीं था मेरा प्यार कभी
मेरी सच्चाई जो भी हो, मेरा तो संसार हैं तुझमे अभी

चाहूँ जितना भी दूर चला जाऊ मैं तुम से अब तो
सच तो बस यही हैं की तुमसे ही मेरी साँसे है अब तो
वो सूरज भी क्या जो निकले अब तुम्हारे बिना रोज
वो तारे भी क्या जो चमके अब तुम्हारे बिना रोज

ये सब तो अब सुना सुना हैं मेरे लिए
अपने भी जो थे वो पराये हैं मेरे लिए
बस तुमको ही सब कुछ माना था मैंने तो
तुम ही मेरा रब और तुम ही मेरा सब अब तो

सिगरेट सी ये जिन्दगी

क्यों तुम बदनाम करते हो उस बिचारे सिगरेट को
क्यों तुम देख नहीं पाते जो दिखाना चाहता हैं वो सब को
सिगरेट को तुम मान लो जैसे की जिन्दगी सा
नशा उसका उतना ही जितना हैं जिन्दगी का

जैसे सिगरेट एक बार जल जाए तो जो होता है
वैसे ही जिन्दगी जो जलने लगे तो सब मुश्किल होता हैं
साँसे थोड़ी मद्दम सी हो जाती हैं
नशा जैसे चढ़ता हैं नफ्ज़ ढीली पढ़ जाती है

पर सीखना उस सिगरेट से ये हैं हम सब को
की जलना तो सभी को दिन हैं जिन्दगी में
बस तय करना हैं की राख बन जमीं में मिल जाना हैं
या धुँआ बनके सब के ऊपर उठ जाना हैं

क्योंकि राख जो मिल जाए मिटटी में एक बार
न उसका कोई वजूद हैं न उसका कोई परवरदिगार
लेकिन उठ गए जो एक बार धुएँ से
तो कौन रोक पायेगा तुम्हे

बस हवा की रुख से हाथ मिलाकर
उड़ चलो इस सबसे दूर जहा सब अलग हो
जहां जिन्दगी भी नयी होगी और कोई जला नहीं पायेगा
हाथ तुम्हारे न बंधे होगे और दिल न कोई तोड़ जायेगा

जिन्दगी क्या है

जिन्दगी क्या है जब पूछा मुझसे किसीने
कुछ देर सोचता रहा मैं खुद भी मन में
क्या जिन्दगी सिर्फ हैं हासिल करने का दूसरा नाम
क्या जिन्दगी सिर्फ हैं किसीको बनाना अपना मकाम?

जिन्दगी तो वो हैं जो दुसरो को खुशी दे
दर्द जितना भी हो दुसरो को जो हसी दे
वो जिन्दगी ही क्या जो खुदगर्जी से भरी हो
जिसमे सिर्फ एक इंसान की ख़ुशी बसी हो

जिदंगी तो वो हैं जो ना हो किसीके हाँ की मोहताज
दुसरो के दर्द का क्यों चाहिए सर हमारे ताज
बस बांटो खुशिया ऐसे की खेत हो खुशहाली के
बस खिल जाओ जैसे की तुम ही हो फुल माली के

आये हो लेकर ये जीवन तो कुछ तो ऐसा कर जाओ
भले ही तुम न खुश रहो पर अमर तुम बन जाओ
यही तो जिन्दगी हैं दोस्तों मेरे
यही तो सब कुछ हैं दोस्तों मेरे।।

Tuesday, October 21, 2014

तू दिसली होतीस एक क्षण

तू दिसली होतीस मला एक क्षण
आणि तिथेच घायाळ झाला माझ मन
तुझ्या शोधात मग फिरलो मी जग सारं
ह्या डोळ्यांना तू दिसलीच नाहीस पण



तुला परत बघायला झालो होतो मी येडा पिसा
तुला सांगू काय तुला शोधला मी कुठे कसा
पण परत दिसलीस मला तू ती हसरी परी नाजूक
आणि होतीस निरागस, जसं काय तूपच साजुक



तुला बघूनच मन भरल्यासारखा वाटलं
माझे सर्व दुखः तुझ्या हसण्यानेच लाटलं
काही क्षण तुला असच बघत राहिलो
आणि माझ्या हृदयाचा दोरच नकळत कापलं

तो कितना अच्छा होता

कोई प्यार हमसे कर लेता 
तो कितना अच्छा होता 
कोई नफरत हमसे न करता 
तो कितना अच्छा होता 

कोई इकरार हमसे कर देता
तो कितना अच्छा होता
कोई इनकार हमे न करता
तो कितना अच्छा होता

कोई साथ हमारे चल देता
तो कितना अच्छा होता
कोई दूर हमसे ना जाता
तो कितना अच्छा होता

कोई हाथ हमारा थाम लेता
तो कितना अच्छा होता
कोई ठोकर मार न जाता
तो कितना अच्छा होता

कोई संग हमारे भी हँसता
तो कितना अच्छा होता
कोई बिन हमारे भी रोता
तो कितना अच्छा होता

कोई जिंदगीभर हमारा होता
तो कितना अच्छा होता
कोई पलभर  भी हमसे न बिछड़ता 
तो कितना अच्छा होता

कोई शुरुआत नयी संग हमारे करता
तो कितना अच्छा होता
कोई बात बीती न करता
तो कितना अच्छा होता

कोई दिल में अपने हमे बसाता
तो कितना अच्छा होता
कोई पैरों की धुल हमे न मानता
तो कितना अच्छा होता

काश कोई तो ऐसा होता
तो कितना अच्छा होता
तो कितना अच्छा होता 

जब

जब दूरियाँ मिलों की होती हैं
जब फाँसले दरमियाँ होते हैं
तब वो भी वहाँ पे रोती हैं
और हम भी यहाँ पे रोते हैं


जब चोट हमे यहाँ लगती हैं
जब लहू हमारा यहाँ बहता हैं
तब वोह भी पे वहाँ पे रोती हैं
और हम भी यहाँ पे रोते हैं


जब मोहब्बत रुसवा होती हैं
जब दिल टूट रहे होते हैं
तब वो भी वहाँ पे रोती हैं
और हम भी यहाँ पे रोते हैं


जब सपने पतझड़ से गिरते हैं
जब आँसू भी सूखे होते हैं
तब वो भी वहाँ पे रोती हैं
और हम भी यहाँ पे रोते हैं


जब आँखें दर्द में होती हैं
जब दुनिया सो रही होती हैं
तब वो भी वहाँ पे रोती हैं
और हम भी यहाँ पे रोते हैं

छोटी छोटी बातें

छोटी छोटी बातों पर भी गुस्सा मुझे इतना आता था आग बबूला होकर फिर जो मैं तुमसे झगड़ जाता था
तुम भी सहम जाती थी फिर थोड़ी और मैं भी शांत हो जाता था छोटी छोटी बातों पर भी जब मैं प्यार जता जाता था
शर्मा कर जब तुम भी मुस्कुराती और मैं भी थोडा मुस्कुराता था छोटी छोटी बातों पर ये सब होता था
पर अब न रही वो छोटी छोटी बाते और अब ना रहेगी वैसी बरसाते अब तो मौसम आया हैं जो जाड़ों का पतझड़ और टूटते रिश्तों के अफसानो का
याद रहेगी मुझे हमारी वो छोटी छोटी बाते याद रहेगी मुझे वो बीती सुहानी बरसातें बस सोचता हूँ मैं आज भी क्या बहुत ही छोटी थी वो छोटी छोटी बाते?







कुछ यूं रहता हूँ मैं

कुछ गुमसुम गुमसुम सा रहता 
मैं मेरी ही तन्हाईयों  में 
मेरे दिल के अरमान ढक जाते थे 
खुद मेरी ही परछाइयों में 

कुछ खफा खफा सा रहता
मैं मेरी ही अंगड़ाइयों में 
मेरे अक्स हमेशा खो जाते थे 
खुद मेरी ही गहराइयों में 

जो सोचता हूँ मैं कभी कभी 
की तुम न होती तो क्या होता 
फिर दिल से मेरे एक आवाज़ निकलती 
की तुम्हारे बिन तो में अधुरा होता 



वो एक लड़की

कभी मन करे तो एक झलक दे जाती कभी दिल में जोरों की धड़क दे जाती
कभी थकी सी आँखों को सुकून दे जाती कभी फिर से जीने का जूनून दे जाती
वो एक लड़की मुझे मेरा वजूद दे जाती वो एक लड़की मुझे मेरा वजूद दे जाती


एक आंधी आयी थी जोरो की

एक आंधी आयी थी जोरो की सब कुछ उड़ाकर ले गयी बस थोड़ी जान बची थी मुझमें वो भी उडाकर ले गयी

थोड़े से ख्वाब छुपे थे मन में वो भी उडाकर ले गयी अरमानो की अलमारी से अरमान चुराकर ले गयी

मेरे नमी सी आँखों के आँसू भी चुराकर ले गयी एक आंधी आयी थी जोरो की सब कुछ उड़ाकर ले गयी सब कुछ चुराकर ले गयी।।

Phoenix

I am completely broken By our heartbreaking clashes, Without ever complaining I always bore all your lashes
Even then in the end you left me Alone with all your ugly abashes But i promise i will rise one day like a Phoenix does from it's own ashes

ओ मेरे यारा


कुछ आग सी लगी हैं मेरे इस दिल में
बस बेचैन हो रहा हूँ में लम्हा लम्हा
कैसे बताऊ मैं तुझको ओ मेरे यारा
कितना तरसता हूँ तुझ बिन ओ मेरे यारा

जिन्दगी भी बहुत सुनी सुनी हैं तुझ बिन अब तो
सोता भी हूँ जो अब तो ख्वाब खाली से होते हैं 
कैसे बताऊ में तुझको ओ मेरे यारा
ना आराम मुझे तुझ बिन ओ मेरे यारा
..

कुछ तुकबन्दियां- #६


बस खोया खोया सा रहता हूँ
मैं खुद अपने ही ख्यालों में
तुझे याद करके रोता हूँ आज भी
क्योंकि डूबा हुआ हूँ आज भी तेरे उन सवालों में


कुछ तुकबंदिया - # 5


सोचता हूँ मैं कभी कभी कि
जो तुम न होती तो क्या होता मेरा
फिर सच्चाई कानों में कह जाती कि
तुम्हारी बदौलत ही तो हैं ये हाल मेरा

नज़्म - #7

अब भी रात बाकी हैं, मेरे साथ बसर कर लो जो तुम। अब भी साँस बाकी हैं, मेरे साथ सफ़र कर लो जो तुम।।

नज़्म - #6

एक कमरा मेरे ख़्वाबों का भी हैं जिसमे ढेर लगे हैं मेरे अरमानों के एक कमरा मेरे ख्वाइशों का भी हैं जिसमे ढेर लगे हैं मेरी टूटी गुंजाइशों के

कुछ तुकबंदिया - #४

मेरा मन करता हैं आज भी बहुत एक मजाक समझकर सब भूल जाऊ लेकिन मजाक न हुआ ये तो सच्चाई हैं कैसे समझाऊ कितनी इसकी गहराई हैं


Monday, October 20, 2014

कुछ तुकबंदिया - #3

कुछ अरमान जो बचे थे सब आंसुओं में बह गए कुछ लफ्ज़ जो कहने थे तुमसे बस दिल में ही रह गए

नज्म - #५

क्यों उदास सी हैं ये जिन्दगी क्यों निराश सी हैं ये जिन्दगी इतनी मद्दम मद्दम चलती हैं फिर भी हताश सी क्यों हैं ये जिन्दगी

नज़्म - #४

कही मेरे ये दिन ना ढल जाए तुम्हारे वापस लौटने से पहले कही साँसों की ये डोर न जल जाए एक आखरी दीदार होने से पहले


तुम नहीं जो अब तो

तुम नहीं जो अब तो क्यों इतना दर्द होता हैं
जाग तो मैं जाता हूँ लेकिन दिल मेरा सोता हैं
तुझसे बिछड़ना तो चाहा था न मैंने कभी
तेरी खुशियों के लिए ही छोड़ जाना पढ़ा तुझे अभी

तुझसे बिछडने का गम मुझे ही तो सबसे ज्यादा हैं
लेकिन तेरी खुशियों को संजो रखूँगा, ये किया मैंने वादा हैं
हो सकता हैं की मैं मर जाऊ, मिट जाऊ एक दिन तन्हाई में
बस सोचता हूँ की क्या सच में तेरी खुशियाँ थी हमारी जुदाई में ?


ना चाहता था मैं कभी की ये मौसम कभी गुजरे
न चाहा था मैंने कभी की ये दिन तेरे बिन उजले
लेकिन जिन्दगी की दास्ताँ तो अब बस यही हैं अब
की जुदाई में हमारे ही तेरी खुशियाँ बसी हैं सब

इन्तजार करूँगा मैं हर पल उस लम्हे का
की जब आँखें खुले एक दिन मेरी,
तो मेरा सूरज उस सुबह उजले
मेरी जान मेरी गलियों से गुजरे

संजो रखूँगा तब तक
तेरी ये सुहानी यादे मेरे लिए
बचा रखूँगा तब तक
मेरी ये साँसे बस तेरे लिए


नज़्म - #३

सोचता हूँ जो कभी कभी की तुम न होती तो क्या होता? क्या सूरज निकलना बंद कर देता? या चाँद रातों को रोशन ना करता? नहीं. बस मैं भी बहुत खुश होता
रातों को चैन से मैं भी सोता
दिन भर बैठकर न कभी रोता
तुझसे न मिलता तो मैं भी आज खुश होता
मैं भी आज खुश होता 



नज़्म - #२

तेरा नामोनिशां मिट जाए मेरे दिल से
तेरी परछाई भी न गुजरे मेरे करिब से
बस इतना ही चाहता हूँ में अब तो
दूर जो चले गयी हो, तो दूर ही रहो मुझसे




कुछ तुकबंदिया - #२

एक वक़्त था की कभी तुमसे रूबरू होने को हम तरसते थे
जो झलक न मिलती तुम्हारी तो सावन मेरी आँखों से बरसते थे


नज़्म - #१

परिंदों के लिए जैसे जरुरी हैं आसमान 
वैसे ही जिन्दगी के लिए जरुरी हैं अरमान
साँसे थम जाये तो जन्नत मिलती हैं,
अरमान न हो तो पाताल की गलियां!



कुछ तुकबंदिया - #१

आँखे मेरी कही देख रही होती हैं पर नज़रे कही और ही होती हैं साँसे मेरी यहाँ चलती हैं मेरी जिन्दगी कही और ही होती है